नानी
शम्पा शाह जी के निमंत्रण पर २०२१ में 'कथादेश' के लिये लिखा एक संस्मरण
यही कोई डेढ़ सौ वर्ष पहले तक भारत में पेशेवर कलाकारों को, यदि पुरुष हों, तो ख़ानदानी अथवा घरानेदार कलाकार, गवैया, संगीतज्ञ आदि कहा जाता था । ढाढ़ी, मिरासी, भाट, कत्थक आदि जाति सूचक सम्बोधन भी प्रचलित थे । प्रतिष्ठित, चर्चित कलाकार हों, तो उस्ताद-पंडित, आचार्य आदि की भी उपाधि प्रदान होती । यानि कलाकारों की श्रेणी में पुरुष कलाकारों को किसी हद तक थोड़ा-बहुत दर्जा मिलता।
लेकिन महिला कलाकार हो तो बात अलग थी । उन्हें केवल तवायफ़, गानेवाली, नाचनेवाली, पतुरिया आदि कहा जाता था । नाम-धन्य हों तो भी बाई के अतिरिक्त कोई उपाधि नाम के साथ टाँकना संभव न था । ऐसे माहौल में, सन् १९०० में जन्मीं मेरी नानी ने जब बचपन में संगीत सीखने की इच्छा व्यक्त की, तो पिता जी के सीधे-सपाट इनकार का सामना करना पड़ा। मिन्नत-ख़ुशामद के बाद इस समझौते पर बात आ कर टिकी, कि एक ईसाई महिला नानी को घर आकर प्यानो सिखा सकती हैं, लेकिन भारतीय संगीत सीखने की अनुमति किसी भी हाल में नहीं मिली । भारतीय संगीत सीखने के स्वप्न को तो नानी पूरा न कर सकीं, लेकिन उनके पुराने फ़ोटो एल्बम में हमें उनके दर्जनों चित्र मिले, जिसमें युवावस्था में बगीचे में सितार, दिलरुबा इत्यादि लिये, बजाने की मुद्रा में उन्होंने अपने फोटो खिंचवा रखे थे । सम्भवत: यह सारे चित्र उन्होंने विवाहोपरान्त खिंचवाये होंगे, कड़े पैतृक शासन से स्वतन्त्र होने पर ।
नानी का नाम पूर्णिमा मनोहरलाल था, या यूँ कहिये कि विवाहोपरान्त वे इस नाम से जानी जाती थीं । वैसे विवाह से पूर्व वे फ़ीबी (Phoebe ) रावत थीं । अट्ठारह वर्ष की आयु में उनके पिता पादरी उत्तम सिंह धर्म परिवर्तन कर ईसाई बन गये थे, इस लिये सभी संतानों का नाम ईसाई धर्म अनुसार ही रखा गया, और नानी का नाम ग्रीक देवी फ़ीबी पर पड़ गया । चित्रकार मनोहरलाल कार्की से विवाहोपरान्त उन्होंने पूर्णिमा मनोहरलाल नाम अपना लिया । पिता की इच्छा के विरुद्ध विवाह कर लेने पर नानी को परिवार से बेदखल भी किया गया, और जब दुर्भाग्यवश कम आयु में ही नाना अचानक चल बसे, तो अपना और तीन बेटियों के पालन पोषण का भार अकेले नानी को सम्भालना पड़ा, या यों कहिये कि उन्हें आत्मनिर्भर होना पड़ा । परिवार तो पहले ही बेदखल कर चुका था, तो उससे सहायता की आशा करना व्यर्थ था । बेटियों में सबसे बड़ी, यानि मेरी माँ, केवल दस बरस की थी जब पिता चल बसे, तो वे कहाँ माँ की मदद कर पातीं । नानी ने न किसी के सामने हाथ फैलाये, न कहीं रोईं गिड़गिड़ाईं । बस, जुट गईं अपनी बच्चियों के पालन पोषण में । भारतीय संगीत तो वे नहीं सीख पाईं थीं, लेकिन पढ़ाई में कहीं कोई कसर नहीं छूटी थी, सो गणित में स्नातकोत्तर स्तर तक शिक्षित नानी ने शिक्षा संस्थानों में काम कर अपना घर चलाया और बेटियों को पढ़ा-लिखा कर सक्षम बनाया। यही नहीं, तीनों बेटियों को संगीत, चित्रकला आदि सीखने, समझने, परखने का भी अवसर दिया ।
मेरा और मेरी अनुजा रागिनी का पोषण नानी की निगरानी में हुआ । मेरी आयु लगभग छ:-सात वर्ष की रही होगी जब नानी हमारे साथ रहने इलाहाबाद आ गईं । इससे पहले गर्मी की छुट्टी होते ही हमारा परिवार नानी के पास नैनीताल पहुँच जाता, और मैं नानी के लाड़-दुलार का आनन्द जम के लूटती । जब वे स्थाई रूप से हमारे साथ ही रहने लगीं, तो उनका लाड़-प्यार तो मिला ही, साथ ही उनके अनुशासन में बहुत कुछ सीख पाई ।
पता नहीं वे वास्तव में सुन्दर थीं कि नहीं, या मेरी ही स्नेह से धुँधलाई आँखों को वे इतनी सुन्दर नज़र आती थीं, लेकिन उनके व्यक्तित्व में एक अलग प्रकार की गरिमा थी, ओज था । मैंने उन्हें कभी रंगीन वस्त्र धारण करते नहीं देखा। सदा वैधव्य को चिन्हित करने वाले श्वेत वस्त्र ही पहने देखा । कभी कोई गहना-गाठी से सुसज्जित भी नहीं देखा, लेकिन न जाने क्या बात थी उनमें कि जो देखता, एक बार ठिठक कर रह जाता, या फिर हाथ जोड़ लेता उनके सामने । ऐसा भी नहीं था कि कोई विशेष दबंगई हो उनके स्वभाव में। उल्टे वे बहुत ही शांत, विलग सी और मितभाषी थीं ।
बचपन में उनके हाथ के बुने एक से एक डिज़ाइन वाले स्वेटर आदि हम दोनो बहनों ने खूब पहने । बढ़िया से बढ़िया मुरब्बे, जेली, जैम आदि भी वे घर पर बना कर खिलाती थीं और हम चटकारें ले हजम कर जाते । मेरा पहला हारमोनियम उन्होंने ही मुझे भेंट दिया, जब उन्हें लगा कि संगीत में मेरा मन लग चुका है । लेकिन ये सब पढ़ कर ये मत सोच बैठियेगा कि उनका समय नाती-पोतों की देख-रेख में, या घर-परिवार को संभालने में ही निकल जाता था। इतने में कहाँ सन्तुष्ट हो जातीं हमारी सुपर-वुमन नानी ! घर के एक कमरे में पहले उन्होंने बच्चों के लिये Preparatory school खोला, और आस पास के बच्चों को पढाने लगीं । कुछ ही दिनों में विद्यार्थियों की संख्या इस क़दर बढ़ गई, कि पास का मकान किराये पर लेकर उसमें स्कूल चलाया । जैसे जैसे विद्यार्थियों की संख्या बढ़ती, अध्यापकों की, कर्मचारियों की संख्या में भी बढ़ोतरी होती । उनके विद्यालय के द्वार हर वर्ग के बच्चे के लिये स्वागत में खुले रहते थे । बच्चा दिव्यांग हो, या निम्न आय-वर्ग का हो, सब बच्चों के साथ ही पढता-लिखता, खाता, खेलता । समावेशी शिक्षा प्रणाली के नारे लगने से कई दशक पहले ही नानी ने इस प्रणाली को सहर्ष अपनाया और स्वीकारा ।
पर ऐसा भी नहीं था कि हमारे रिश्ते में सदैव संवाद बना रहा । मैंने अक्सर उनको परेशान किया और उनका विरोध भी किया, ये मैं कबूल करती हूँ। इसमें सन्देह नहीं कि नानी प्रगतिशील थीं, पितृसत्तात्मकता का विरोध करती थीं, बार बार चेतावनी देतीं थीं कि पढ़-लिख कर आत्मनिर्भर होना कितना आवश्यक है, लेकिन साथ ही ये भी मानती थीं कि लड़कियों का चाल-चलन, पहनना-ओढ़ना ऐसा होना चाहिये कि बेवजह पुरुषों क ध्यान उन पर न जाये । इन्हीं सब मामलों में मेरी और उनकी ठन जाती थी कई बार ।
नानी बड़े जतन से हम दोनो बहनों के लम्बे केश सँवारा करती थीं और तेल-फुलेल लगा कर कस कस के चोटियाँ बाँध देती थीं । पंद्रह -सोलह वर्ष की आयु में मैंने लम्बे-घने बाल चोटी से मुक्त कर, खुले-लहराते छोड़ कर किसी आयोजन में जाने का मन बना लिया ।नानी ने तुरत मना कर दिया ये कह कर कि ये उचित न होगा । उन्होंने लाख समझाने का प्रयास किया, और मैंने भी उन्हें लाख मनाने की कोशिश की, लेकिन दोनो दल अड़े रहे अपनी अपनी बात पर । अन्त में झुँझला के नानी बोल पड़ीं कि इतने लंबे बाल खोल कर केवल चुड़ैलें घूमा करती हैं, बेटा, अच्छे घरों की बेटियाँ नहीं। बस, फिर क्या था ! मैंने झट कैंची उठाई, कमर से काफ़ी नीचे तक लहराती चोटी को एक हाथ में लिया और घच्च से कंधों के पास से काट डाला ! कुछ दिन नानी और नतनी के बीच बातचीत बंद रही, फिर मैंने घुटने टेक दिये और अपने किये के लिये क्षमा माँग ली । उन्होंने क्षमा तो कर दिया पर ऐसे ही न जाने फिर कितनी बार मैंने उनको त्रस्त किया ।
हिन्दुस्तानी संगीत उन्हें बेहद पसन्द था, सीखने की भी प्रबल इच्छा थी जो वे पूरी न कर पाईं । लेकिन एक महिला संगीत द्वारा अपनी आजीविका चलाये, ये उन्हें उचित नहीं लगता था, और इसी लिये उन्होंने अपनी बेटियों को संगीत सिखाया अवश्य परन्तु पेशेवर कलाकार बनने की अनुमति नहीं दी । ऐसा न होता तो शायद मेरी माँ कलाकार बनना ही पसन्द करतीं। आगे चल कर मेरी माँ ने न केवल मुझे संगीत की शिक्षा दिलवाई, पर कलाकार बनने की हिम्मत भी जुटाई । कभी कभी तो ये लगता है कि ये सब संगीत की बदौलत जो मुझे मान-सम्मान, व स्नेह मिला है, नानी के संगीत-प्रेमी DNA का ही असर है मुझ पर । फिर कभी ये भी सोचती हूँ कि क्या मेरा पेशेवर कलाकार बनना उन्हें ठीक लगता कि नहीं । मैंने मंच पर गाना आरम्भ किया तो वे कभी कभी सुनने आतीं और प्रसन्न हो कहतीं - अब तो तू प्रोफ़ेश्नल के जैसे गाने लगी है । यह स्पष्ट नहीं है कि प्रोफ़ेश्नल से उनका क्या तात्पर्य था - गायकी के स्तर से सम्बन्धित या फिर मेरी आजीविका से । इस बात पर कभी बहस-चर्चा होती तो ही पता चलता ।



आपकी नानी और माँ के बारे में podcast में तो सुना ही था, पर यहाँ पढ़कर कुछ अलग ही मज़ा आया — शायद इसलिए की मुझे अपनी नानी और दादी की याद आयी। उनके बारे में कभी लिखूँगा, यहाँ सिर्फ़ इतना की इन विलक्षण औरतों ने हम सब के लिए क्या मिसालें क़ायम की हैं!
Aww so much fun reading it , became nostalgic…